निबंध की परिभाषा एवं प्रकार

निबंध शब्द रूप शुद्ध भारतीय है निबन्ध्नातीति निबंधः के आधार पर इस शब्द का अर्थ ग्रहण किया जाता था । प्राचीन काल में पोथियों  को सिल कर रखने की प्रथा थी । उसे निबंध कहा गया . किंतु आधुनिक संदर्भ में निबंध का अर्थ संकोच खो गया है और यह एक विधा विशेष के रूप में प्रचलित है.  आज यह अंग्रेजी के Essay का पर्याय हो गया है । Essay  शब्द फ्रेंच के Essais  से व्युत्पन्न है .Essais  का अर्थ होता है प्रयास करना या प्रयत्न करना । आधुनिक काल में निबंध का जो स्वरूप है वह फ्रांस में ही उत्पन्न हुआ माना जाता है । फ्रांस ही निबंध की  उद्गम भूमि है ।  फ्रेंच साहित्यकार मान्तेन को  निबंध का जन्मदाता माना जाता है । मार्च 1571  में उन्होंने भाषण दिया, जिसका इंग्लैंड के  जॉन प्लोरियो  ने 1590 मैं अनुवाद किया, यहीं से निबंध का जन्म माना जाता है ।

 मान्तेन ने निबंध के विषय को लेकर लिखा है कि-” I am the subject of my essays because I myself am the only person whom I know thoroughly .”  इस कथन के आधार पर निबंध में निजता  व्यक्तित्व आत्मा भी व्यक्ति या आत्म प्रकाशन की प्रवृत्ति शिकार करता हुआ हम देखते हैं.  बेकन ने निबंधों में निजता के साथ-साथ विचार तत्व को भी महत्त्व दिया है । वह निबंधों को विकीर्ण  विचार(Dispersed meditation)  कहते हैं । जॉनसन निबंध को मस्तिष्क का थका हुआ बुद्धि विलास मानते हैं ,वह कहते हैं कि निबंध एक स्वच्छन्द  सूत्र है,  जिसने  ना कोई क्रम और ना ही कोई व्यवस्था होती है-  Essay is the loose sally of mind an irregular and undigested piece, not a regular and orderly composition .  वह ढीली ढाली  अव्यवस्थित और अपरिपक्वव रचना मानतें है ।

       पाश्चात्य विद्वानों ने विचार ,व्यक्तित्व,  आत्मीयता और मुक्त प्रवाह को निबंध का विशेष गुण माना है. मान्तेन , जॉनसन, चार्ल्स लैंब,  एडीसन आदि ने निबंध को इसी रूप में स्वीकार किया है ।

 हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक और निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल निबंध को गद्य की कसौटी मानते हुए कहते हैं कि -”  आधुनिक पाश्चात्य लक्षणों के अनुसार निबंध उसी को कहना चाहिए जिसमें व्यक्तित्व या व्यक्तिगत विशेषता हो. बात तो ठीक है यदि ठीक तरह से समझी जाए । व्यक्तिगत विशेषता का यह मतलब नहीं कि उसकी प्रदर्शन के लिए विचारों की श्रृंखला रखी ही ना जाए या जानबूझकर जगह जगह से तोड़ दी जाए ।”  आगे वे कहते हैं- “ निबंध लेखक जिधर चलता है उधर अपनी संपूर्ण मानसिक सत्ता अर्थात बुद्धि और भावात्मक दोनों लिए हुए । आचार्य शुक्ल निबंध में और ह्रदय के समन्वय और क्रमबद्ध विचार पर पल देते हैं ।”

       निबंध को परिभाषित करते हुए बाबू गुलाब राय ने लिखा है कि- “ निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं,  जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का प्रतिपादन एक  विशेष निजीपन , स्वच्छंदता,सौष्ठव  सजीवता के साथ  ही संगति और  सुसंबद्धता के साथ  किया गया हो.”  निबंध में निजीपन  और स्वच्छंदता के साथ-साथ संगति और सुसंबद्धता अनिवार्य तत्व है ।

       निबंध और लेख में अंतर होता है लेख को अंग्रेजी में Article  कहते हैं.  लिख विषय प्रधान होता है जबकि निबंध मैं साहित्यकार का व्यक्तित्व प्रधान होता है.  लेख में रचनाकार अध्ययन के आधार पर अपने विषय संबंधी विचार को स्थापित करता है निबंध में मत प्रतिपादन जैसी कोई स्थिति नहीं होती ।

       निबंध और प्रबंध में भी अंतर होता है । निबंध एक ढीली-ढाली व्यक्तित्व प्रधान और अव्यवस्थित रचना है ,जबकि प्रबन्ध आलोचनात्मक विचार-विश्लेषण से युक्त शोधपूर्ण और गंभीर रचना है । इसमें व्यक्तित्व की तुलना में बुद्धि का अधिक योगदान होता है । दोनों में आकार भेद भी है । निबंध की एक विशेषता उसकी संक्षिप्तता भी है ,जबकि प्रबंध का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत होता है । (निबंध श्री से सभार)

हिन्दी निबन्ध :प्रकार

सामान्यतः हिन्दी निबन्ध को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया गया है –

1.   विषय प्रधान निबंध

2.   भावात्मक निबंध

3.   वर्णन प्रधान निबंध

4.   आत्म परक निबंध

5.   हास्य और व्यंग्य प्रधान निबंध

1. विषय प्रधान निबंध – सामान्यतः ऐसी मान्यता थी कि निबंध में व्यक्तित्व प्रधान होता है ,विषय नहीं । बेकन ने निजता के साथ-साथ विचार को भी निबंध तत्व स्वीकार किया है । इस कोटि के निबंधों में विषय आधारित चिन्तन ,मनन और तर्क प्रधान होता है । आचार्य शुक्ल कहते हैं , “शुद्ध विचारात्मक निबंधों का उत्कर्ष वही कहा जा सकता है, जहाँ एक-एक पैराग्राफ में विचार कसे गये हों और एक एक वाक्य किसी सम्बद्ध विचार खंड से लिए हों।”

       इस प्रकार के निबंधों में लेखक एक विषय को लेकर उस पर पूर्ण गहराई और पांडित्य के साथ गंभीर विचार करता है । भाषा गंभीर विषयानुकुल और परिमार्जित रहती है ।

2. भावात्मक निबंध -इस कोटि के निबंधों में अनुभूति और भावना की तीव्रता मिलती है । यहाँ कल्पना तत्व प्रधान होता है । डॉ. रघुवीर सिंह ,माखनलाल चतुर्वेदी , रामवृक्ष बेनीपुरी आदि के निबंध इसी प्रकार के हैं । भाषा की सरसता और आलंकारिक शैली के कारण इस प्रकार के निबंधों में गद्यकाव्य जैसी छटा देखि जा सकती है ।भावावेग के कारण कहीं-कहीं प्रवाह बाधित भी हो जाता है ।  

3. वर्णन प्रधान निबंध – इस कोटि के निबंध में किसी वस्तु ,स्थान ,दृश्य ,या स्थिति का वर्णन किया जाता है । यह वर्णन ठीक-ठीक यथातथ्य वर्णन नहीं होता , वरन लेखक अपनी कल्पना के आधार पर मनोरम रूप रूप देता चलता है । इसमें कथा तत्व की प्रधानता रहती है । भाषा सरल और स्पष्ट तथा शैली आलंकारिक होती है । माखनलाल चतुर्वेदी ,सियाराम शरण गुप्त ,कन्हैया लाल मिश्र आदि के कतिपय निबंध इसी प्रकार के हैं ।

4. ललित निबंध –  इस कोटि के निबंधों में लेखक का व्यक्तित्व प्रधान होता है । सही अर्थों में इसे ही निबंध कह सकते हैं । इसमें विषय प्रमुख नहीं रहता । कोई घटना ,कोई प्रतिक्रिया या कोई भी स्थिति लेखक के लिए प्रेरणा का काम करती है । भाषा सरस ,व्यंग्य एवं प्रवाह से पूर्ण तथा लयात्मक होती है । निबंध में सोच और कल्पना की मुक्ति ही सृजनशीलता का आधार होती है ।लेखक की तन्मयता के साथ मिलकर ज्ञानात्मक संवेदना और लालित्य का अदभुत साहचर्य घटित होता है । हजारी प्रसाद द्विवेदी ,गुलाब राय ,दिनकर विद्यानिवास मिश्र ,कुबेर नाथ राय आदि इस कोटि के निबंधकार हैं । 

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