विधिक सूक्तियाँ (LEGAL MAXIM)

विधिक सूक्तियाँ (LEGAL MAXIM) महत्वपूर्ण विधिक भाषा की सूक्तियों की व्याख्या

1. Actus non facit reum, nisimens sitrea [latin] केवल कार्य किसी को अपराधी नहीं बनाता यदि उसका मन का भी अपराधिकरण न हो

[The act itself does not constitute guilt unless done with a guilty intent]

कॉमन लॉ के अन्तर्गत अपराध गठित करने के लिए आपराधिक मस्तिष्क का होना आवश्यक माना गया है। यह प्रसिद्ध सूत्र है कि “केवल कार्य व्यक्ति को आपराधी नहीं बनाता, यदि उसका मन भी अपराधी न हो।” इस सूत्र का प्रारम्भ अति प्राचीन है। लार्ड कोक इसके जन्मदाता माने जाते हैं। परन्तु उन्होंने इसे कहाँ से लिया इस बारे में मतैक्य नहीं है। प्रारम्भिक रूप में इस सूत्र का अनुमति अर्थ लिया गया कि विधि के दोष के लिए नैतिक दोष भी आवश्यक है। कारण यह माना गया कि विधि और सदाचार में विरोध की सर्वदा संभावना बनी रहती है। यह इसलिए भी माना गया कि विधि में अनुशासित आवश्यक रूप में शारीरिक है जैसे सम्पत्ति या स्वतंत्रता का अपहरण या अन्ततः प्राणदण्ड।

2. Audi Alteram Partem ( दूसरे पक्ष को सुनो)

“दूसरे पक्ष को सुनों” यह सूक्ति न्यायिक क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण है, इसके अनुसार दूसरे पक्ष को सुना जाय अथवा किसी भी व्यक्ति को किसी न्यायिक अथवा कल्प प्रक्रिया में बिना सुनवायी के दण्डित या सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। इसकी अपेक्ष है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने बचाव का अवसर मिलना चाहिए। यह सिद्धान्त उतना ही पुराना है, जितना कि संसार की संरचना।

3. Actus Curiae Neminem Gravabit (न्यायालय का कृत्य किसी व्यक्ति को कुप्रभावित नहीं करेगा)

इस सूक्ति का उद्देश्य यह है कि यदि न्यायालय में कार्य की बहुलता  के कारण या प्रश्नों की पेचीदगी के कारण कोई विलम्ब होता है तो इससे पक्षकारों को प्रभावित नहीं होना चाहिए। इवान्स बनाम रीस के बाद में यह कहा गया कि कॉमन ला के अन्तर्गत न्यायालय के व्यवहार में इस सिद्धान्त को इसलिए अंगीकृत किया गया कि न्यायालय के कृत्य के कारण के होने वाले विलम्ब से बादकारी पर पड़ने वाले कुप्रभाव को निवारित किया जा सके। किन्तु कुछ विशेष कारणों के कारण किन्हीं वादों में यह सूक्ति लागू नही

होगी जैसे 1. यदि विलम्ब न्यायालय के कृत्य के कारण नहीं हुआ है, तो सूक्ति लागू नहीं होगी।

2. यदि हानि अधिकरण के अधिकारियों के विलम्ब या गलती के कारण हुआ है, तो पक्षकार को उपचार प्राप्त नहीं होगा।

3. न्यायालय के कृत्य में और पक्षकार को होने वाली कठिनाई में उचित सम्बन्ध होना चाहिए अन्यथा यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा।

4. Delegatus non potest delegare (Latin)

प्रत्यायोजित शक्ति का और आगे प्रत्यायोजन नहीं हो सकता है

(A delegated power cannot be further delegated) ‘प्रत्यायोजित शक्ति का पुनः आगे प्रत्यायोजन नहीं हो सकता’ सूत्र स्वामी अभिकर्ता सम्बन्धी अभिकरण विधि से सम्बन्धित है। स्वामी और अभिकर्ता का सम्बन्ध संविदा पर आधारित है। संविदा से कुछ मूल अपेक्षाएं उत्पन्न होती हैं उदाहरण के लिए अभिकर्ता का कर्तव्य है कि वह मालिक द्वारा सौपा गया कार्य करे; मालिक के अनुदेश का पालन करे, युक्तियुक्त तत्परता और कौशल का प्रयोग करें, अपने कर्तव्य एवं हित में संघर्ष न आने दे, गुप्त लाभ प्राप्त करने का प्रयास न करे, प्राप्त राशियों का संदाय करे, मालिक मांग पर उचित लेखा प्रस्तुत करे आदिं इन सब कर्तव्यों ये एक बात स्पष्ट है कि मालिक अभिकर्ता पर पूर्ण विश्वास कर अपना कार्य सौंपता है।

5. Extrup causa non oritur actio ( Latin) (अधम कार्य से उत्पन्न कोई वाद नहीं चल सकता)

इस सूत्र का आधार है कि कोई भी बाद जो अवैधानिक प्रतिज्ञा या संव्यवहार से उत्पन्न हुआ है वह नहीं चलाया जा सकता है। सम्मति के आधार पर अवैधानिक युद्ध के पक्षकार हरजाने का वाद नहीं ला सकते क्योंकि यह अवैधानिक और शून्य होगा और इस सिद्धान्त के आधार पर कि “अयमकार्य से उत्पन्न कोई वाद नहीं चला सकता’ कार्यवाही खारिज कर दी जाऐगी। यह लोकनीति का विषय है कि न्यायालय किसी भी तरह अवैधानिक संव्यवहारों को प्रश्रय नहीं देंगे।

6. Falsus in Uno Falsus in Omnibus (एक बात में मिथ्या तो सब बात में मिथ्या)

इस सूक्ति का तात्पर्य यह है कि यदि कोई साक्षी जानबूझकर धोखा देने की दृष्टि से गवाही देता है और गवाही ऐसे बिन्दु पर है, जो अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य से सम्बन्धित है तो ऐसे गवाह की सभी गतिविधियों को अस्वीकृत किया जा सकता है। यह सिद्धान्त केवल साक्ष्य सम्बन्धी नियम है और केवल साक्ष्य के भार से सम्बन्धित है।

7. Generalia Specialibus Non Derogant

(सामान्य से विशिष्ट की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती) यह सूक्ति संविधियों के निर्वचन से सम्बन्धित है, और विशिष्टतः विवक्षा द्वारा निरसन के सम्बन्ध में लागू होती है। विशिष्ट अधिनियमों को सामान्य अधिनियमों द्वारा तब तक निरसन नहीं माना जा सकता जब तक कि पूर्व अधिनियम के बारे में अभिव्यक्त सन्दर्भ नहीं है अथवा दोनों अधिनियमों के बीच आवश्यक असंगतता नहीं है। यह प्रयास किया जाना चाहिए कि दोनों अधिनियमों को लागू किया जाय

8. Ignorantia legis neminem excusat (Latin)

(विधि की अनभिज्ञता कोई प्रतिहेतु नहीं है) (Ignorance of law is no excuse) “विधि की अनभिज्ञता कोई प्रतिहेतु नहीं है” सूक्ति इस उपधारणा  पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति को विधि की जानकारी है। विधिक ज्ञान की। के कारण यह मान्यता है कि व्यक्तियों को अपने कृत्यों के परिणाम से इस आधार पर बचाव नहीं मिल सकता कि उन्हें विधि की जानकारी नहीं थी। ये की अनभिज्ञता न तो आपराधिक दण्ड से बचाव दे सकती है और न सविता भंग होने पर हरजाने से बचाव प्रस्तुत कर सकती है।

9. Injura non-remota causa sed proxima spectatur (Latin) विधि में अव्यवहित या निकट के हेतुक पर ध्यान दिया जाता है, दूर के दुर  पर नहीं

(In Law the immediate or proximate not the remote cause

of any event is regarded) यह सूत्र अपकृत्य के लिए दायित्व निर्धारण हेतु प्रतिपादित किया गया है। एक दोषपूर्ण कृत्य के अन्तहीन परिणाम हो सकते हैं या परिणामों से परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। दायित्व का निर्धारण कारण और परिणाम के व्यावहारिक सम्बन्ध पर निर्धारित होता है। इसी कारण यह सूत्र है कि “विधि में निकट के हेतुक पर ध्यान दिया जाता है, दूर के हेतुक पर नहीं”।

10. Nemo dat quod non habet (Latin) कोई व्यक्ति अपने हक से ऊँचा हक नहीं अन्तरित कर सकता

(No one can transfer better tittle than he himself has) यह सूत्र माल विक्रय के सम्बन्ध में प्रतिपादित किया गया है। यद्यपि सामानों का क्रेता बिना हक वाले विक्रेता के विरुद्ध उपचार रख सकता है फिर नियमतः विक्रय क्रेता को माल के स्वामी के विरूद्ध कोई हक नहीं प्रदान करता है। क्रेता और माल के स्वामी के बीच क्रेता सावधान का सिद्धान्त लागू होता है।

11. Par in perem imperium non habet ( Latin) एक समान स्थिति वाला दूसरे समान स्थिति वाले पर प्रभुत्व नहीं जता सकता

(An equal has no power over an equal)

यह सूक्ति अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अन्तर्गत राज्यों की सम्प्रभुता सम्पन्नता जनित उन्मुक्ति के सम्बन्ध में कही गयी है। अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अन्तर्गत संयुक्त राष्ट्र संगठन अपने सभी सदस्यों की प्रभुत्व सम्पन्न समता के सिद्धान्त पर आधारित है। सभी राज्यों को एक दूसरे के साथ विधि में समानता का अधिकार है। राज्यों की प्रभुता सम्पन्न समानता के ये तत्व हैं कि राज्य न्यायिक रूप से समान है।

12. Qui Facit Per Alium Facit Perse

(वह जो दूसरे के माध्यम से कृत्य करता है विधि में स्वयं द्वारा किया गया माना जाता है)

यह सूक्ति मालिक और अभिकर्ता के सम्बन्धों के निर्धारण हेतु लागू किया जाता है। जहाँ पर कोई संविदा एक मालिक के अभिकर्ता के माध्यम से की जाती है वहाँ वाद लाने के लिए अथवा उसके विरुद्ध वाद लाने के लिए मालिक उचित पक्षकार होता है। ऐसा प्रायः संविदा भंग के मामलों में आवश्यक होता है, कारण यह है कि अभिकर्ता केवल एक माध्यम होता है, जिससे संविदा सम्पन्न होती हैं।

13. Res Ipsa Loquitur (घटना स्वयं प्रमाण है)

प्रायः इस सिद्धान्त को अपकृत्य के मामलों में लागू किया जाता है। यह इस बात का द्योतक है कि घटना प्रतिवादी की उपेक्षा का स्वयं स्पष्टीकरण करती है। यह वादी कसे सबूत के भार से मुक्त करती हैं।

इस सूक्ति के लागू किये जाने के लिए निम्नलिखित शर्ते पूरी करनी होती है

1. सम्पत्ति के नियन्त्रण का तथ्य।

2. दुर्घटना हेतु किसी व्यक्ति की उपेक्षा सम्बन्धी जिम्मेदारी। 3. युक्तियुक्त स्पष्टीकरण का अभाव।

14. Ubi Jus ibi idem remedium (Latin) जहाँ अधिकार है वहाँ उपचार है, जहाँ क्षति है वहाँ उपचार 

(Where there is right, there is remedy) अपकृत्य विधि का विकास “जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है” सूक्ति से हुआ है। पारम्परिक कॉमन लॉ युक्ति आशय है कि कॉमन लॉ जहाँ अधिकार -प्रदान करता है वह वहाँ सुरक्षा भी प्रदान करता है या ऐसे अधिकारों में हस्तक्षेप के विरूद्ध कार्यवाही का अधिकार प्रदान करता है या उन अधिकारों के भंग होने पर उपचार प्रदान करता है।

15. Ut res magis valeat quam pereat (Latin) अमान्य से मान्य करना अच्छा है।

(That is may rather become operative than null) ‘अमान्य से मान्य करना अच्छा है’ सूक्ति एक संविदा के अर्थान्वयन से सम्बन्धित सूक्ति है संविदा का करार के मामले में चाहे वह दस्तावेज पर आधारित हो अथवा मौखिक न्यायालय को इस सिद्धान्त पर निर्वचन करना होगा कि ‘अमान्य से मान्य करना अच्छा है’

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