मूट कोर्ट अर्थ एवं महत्व

 विधि के विद्यार्थियों के लिए कृत्रिम न्यायालय का गठन करना मूट कोर्ट (आभासी न्यायालय) के नाम से जाना जाता है। यह न्यायालय द्वारा वर्णित किसी विनिर्दिष्ट वाद अथवा विनिर्दिष्ट विषय या विवाद्यक अथवा इस प्रयोजनार्थ तैयार किये गये किसी काल्पनिक वाद पर एक प्रकार का वाद-विवाद (debate) होता है।

शास्त्रार्थ (Mooting) एक विशिष्ट प्रकार का स्वांग (simulated)  समझा जाता है जिसमें विद्यार्थियों के स्वांग रखे  गये न्यायालयों (simulation court) के समक्ष विधि के बिन्दुओं (Points of law) पर बहस करने के लिए कहा जाता है। विद्यार्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सम्मत करने योग्य विधिक बहस को तैयार करने एवं उसे प्रस्तुत करने में अपनी समस्त कुशलता का प्रयोग करेंगे। मूट कोर्ट (आभासी न्यायालय) में भागीदारी व्यावहारिक कुशलता का विकास करती है। इससे विधि के विद्यार्थियों में आत्म-विश्वास का विकास होता है जो विधि व्यवसाय में सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक  है। यह विद्यार्थियों को वाद-पत्र(Plaint) तैयार करने, लिखित कथनों और बहस के बिन्दुओं को तैयार करने के अतिरिक्त, आरोपों आदि को विचरित करने का अवसर प्रदान करता है। उन्हें जनहित याचिका प्रारूपित करने तथा उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का अनुभव  प्राप्त हो सकता है। वे इससे प्रति-परीक्षा एवं बहस की कला सीख सकते हैं जो वादों को जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इससे विद्यार्थियों को वादों में अन्तर्वलित विनिर्दिष्ट विवाद्यकों पर सुसंगत वाद एकत्र करने का अनुभव प्राप्त होता है। इस प्रकार, यह विधि के विद्यार्थियों को वकालत की प्रक्रिया के प्रति सजग होने तथा वकालत के कौशल को प्राप्त करने के लिए समर्थ बनायेगा। विद्यार्थी, उन्हें सौंपे गये वादों में विधि के सिद्धान्तों को लागू करने का अवसर पाते हैं।

मूट कोर्ट (आभासी न्यायालय) में भागीदारी न केवल विधिक कुशलता का विकास करती हैे, बल्कि वाद प्रस्तुत करने की कुशलता का भी विकास करती हैं। इससे विद्यार्थी अनुनय करने की कला सीखने में भी समर्थ हो जाते हैं। इससे उनमें लोगों के सामने बोलने का आत्म-विश्वास उत्पन्न होता है। वास्तव में, भाषा पर अच्छा अधिकार, अभिव्यक्त करने की अच्छी शक्ति, विधि का अच्छा ज्ञान, अच्छा सामान्य बोध तथा स्पष्ट रूप से समझने एवं आपातकाल में कार्य करने की योग्यता ये सभी सफल अधिवक्ता बनने में सहायक होते हैं। ये गुण अभ्यास से ही प्राप्त किये जाते हैं। मूट कोर्ट का गठन विद्यार्थियों को उक्त गुण प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता हैं।

मूट कोर्ट से विद्यार्थियों में अदालत के कमरे (Court-room) के शिष्टाचार (etiquette) के साथ अपने पक्ष पर बहस करने की योग्यता का विकास होता है। इसमें भागीदारी द्वारा विद्यार्थियों में विधिक विवाद्यकों को पहचानने, विधिक सामग्री एकत्र करने, बहस की तैयारी करने, बिना उत्तेजित हुए बहस करने तथा न्यायालय अथवा विरोधी पक्ष से पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देने की योग्यता विकसित होती है। ये गुण विधि-व्यवसाय में सफलता के लिए आवश्यक समझे जाते हैं। इसमें भागीदारी करके, विद्यार्थी न्यायालय से संव्यवहार करने का ढंग सीखते हैं। उन्हें न्यायालय के प्रति आदरपूर्ण होने के महत्व की व्यावहारिक जानकारी हो सकती है। माननीय न्यायमूर्ति राजकिशोर प्रसाद के अनुसार-

‘‘बौद्धिक साधन (Intellectual equipment) से अधिक महत्वपूर्ण नैतिक साधन (Moral equipment)  होता है। किसी अधिवक्ता से सदैव यह अपेक्षा की जाती है कि वह शान्ति तथा मनोहारी प्रवृत्ति बनाये रखेगा। उसे न्यायालय के प्रति आदरपूर्ण होना चाहिए। वह इस कर्तव्य को न केवल न्यायिक पद के अस्थाई पदधारी के कारण रखता है बल्कि उसके सर्वोच्च महत्व को बनाये रखने के लिए भी रखता है। वह आदरपूर्ण रहते हुए स्वतंत्रता तथा निर्भय रूप से श्रद्धा का भाव रख सकता है।

इसे कभी भी, जब न्यायाधीश बोल  रहे हों, बीच में नहीं टोकना चाहिए बल्कि न्यायाधीश के अपना वाक्य पूरा करने का प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसे न्यायाधीश द्वारा किये गये प्रश्न पर सभी प्रकार के विचार करना चाहिए और तब उसका उत्तर देना चाहिए। जल्दीबाजी में दिया गया उत्तर उसे जाल में फंसा सकता है।

अधिवक्ता को न तो उस समय बहस करनी चाहिए जब उसे बहस करने को न कहा गया हो और न ही अपनी बहस को उस समय जारी रखना चाहिए जब न्यायाधीश उसके पक्ष में हो और उससे अधिक सुनने के लिए चिन्तित न हो।

अधिवक्ता को उस समय अपना सन्तुलन नहीं खोना चाहिए जब न्यायाधीश ने उसकी आशा के अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त न की हो।’’
इन गुणों को अनुभव द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। मूट कोर्ट में भागीदारी विद्यार्थियों को ऐसा अनुभव प्राप्त करने का अवसर प्रदान करती है।

न्यायालय का अवमान आज देश के समक्ष ज्वलन्त समस्या है। वर्तमान में न्यायालयों में अवमान के वाद वृद्धि पर हैं। न्यायालय के संज्ञान में ऐसे अनेक वाद लाये गये हैं जिनमें अधिवक्ताओं द्वारा न्यायालय का अवमान कारित करना पाया गया है। न्यायालय के अवमान को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि यह विधि के उस नियम को चुनौती देता है जो एक व्यवस्थित समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक होता है। वर्तमान में न्यायालय अत्यन्त सजग है और उस व्यक्ति को (चाहे कितने उच्च पद पर क्यों न हो) धराशायी करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं जो जानबूझकर न्यायालय के आदेश की अवज्ञा करते हैं अथवा न्यायालय के प्राधिकार को कलंकित अथवा उसके महत्व को कम करते हैं अथवा किसी न्यायिक कार्यवाही के सम्यक् अनुक्रम को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित करते हैं या उसमें हस्तक्षेप करते हैं। तथापि समस्त प्रयासों के बावजूद अवमान के वाद वृद्धि पर हैं बालेश्वर देवता बनाम प्रियानाथ मोहन्ती; के वाद में न्यायमूर्ति श्री हंसरिया ने कहा है कि इस न्यायालय ने न्यायालय के आदेश के स्वेच्छायुक्त उल्लघंन की बढ़ती प्रकृति को खेद के साथ दर्ज किया है। यह महसूस किया जाता है कि विधि के गौरव तथा न्याय-प्रशासन के ढाँचे को अखण्ड रखने के लिए वास्तविक रूप से निवारक, भयोत्पादक तथा दृष्टान्तक दण्डादेश अधिनिर्णीत करने का समय आ गया है। यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि मवमान करने वाले व्यक्ति को दण्डित करने का उद्देश्य न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से सुरक्षा प्रदान नही; बल्कि न्याय के सम्यक् प्रशासन में अविधिपूर्ण हस्तक्षेप को रोकना तथा न्याय प्रशासन की पद्धति में जनता के विश्वास की रक्षा करना तथा उसे सुदृढ़ करना हैः

‘‘जब न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग करता है तो वह ऐसा किसी व्यष्टिक न्यायाधीश (Individual Judge)  की गरिमा तथा शिष्टाचार को सत्य सिद्ध करने के लिए नहीं करता है जिस पर व्यक्तिगत रूप से प्रहार किया जाता है अथवा उसे कलंकित किया जाता है बल्कि विधि के गौरव तथा न्याय प्रशासन का समर्थन करने के लिए वह ऐसा करता है। न्यायपालिका का आधार लोगों का उसकी निर्भय तथा निष्पक्ष न्याय प्रदान करने की योग्यता में विश्वास करना है। जब यह आधार स्वयं ही ऐसे कृत्यों से हिल जाये जो न्यायालय के प्राधिकार के लिए, उसकी कार्यप्रणाली में अविश्वास उत्पन्न करके ;क्योंकि (Disaffection) एवं अनादर उत्पन्न करने के लिए आशयित हों तो न्यायिक पद्धति के ढाँचे में जंग लग जाता हैं। कभी-कभी अवमान अज्ञानतावश कारित हो जाते हैं। वे इसलिए कारित हो जाते हैं क्योंकि अवमानकर्ता को अवमान विधि की जानकारी नहीं होती है। मूट कोर्ट में भागीदारी करके विद्यार्थियों को अवमान विधि तथा उसके प्रयोग की पर्याप्त जानकारी हो सकती है और एद्द्वारा वे अवमान जिन्हें अज्ञानतावश कारित किया जाता है, टाले जा सकते हैं।

मूट कोर्ट में भाग लेकर विद्यार्थियों को अधिवक्ता के कर्तव्यों का भी ज्ञान हो जाता है। अधिवक्ताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह न्याय प्रशासन में न्यायालय की सहायता करेंगे। अधिवक्तागण वाद से सम्बन्धित सामग्री संग्रह करते हैं और तद्द्वारा विशुद्ध निर्णय पर पहुँचने में न्यायालय की सहायता करते हैं वे न्यायालय के प्रति आत्यन्तिक रूप से निष्पक्ष होने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं। उनसे तथ्यों के सम्बन्ध में यथार्थपूर्ण कथन करने की अपेक्षा की जाती है। उन्हें तथ्य को तोड़ना-मरोड़ना नहीं चाहिए। वे न्यायालय को भ्रमित न करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं। तथापि अधिवक्ता को चापलूस (Servile)  नहीं होना चाहिए और यदि किसी न्यायिक अधिकारी के विरूद्ध शिकायत का समुचित आधार उपलब्ध हो तो अपनी व्यथा को समुचित प्राधिकारियों तक पहुँचाना न केवल उनका अधिकार है बल्कि उनका कर्तव्य भी है। न्यायालय के प्रति अधिवक्ताओं के बहुत से कर्तव्यों को भारतीय विधिज्ञ परिषद द्वारा संहिताबद्ध किया गया है तथा उनका उल्लंघन व्यावसायिक कदाचार समझा जाता है और अधिवक्ता अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उसे दण्डित किया जाता है। वास्तव में आत्मसंयम तथा न्यायालय के प्रति आदरपूर्ण दृष्टिकोण, संतुलित मस्तिष्क के साथ तथा अतिरंजित कथन; (Over-Statement) दमन(supperession)  विकृतिकरण;(Distortion)अथवा अशोभन (Embellishment)  के बिना विशुद्ध तथ्यों एवं विधि का प्रस्तुतीकरण अच्छी वकालत की अपेक्षाएं हैं। इन गुणों को केवल अभ्यास द्वारा ही प्राप्त किया जा सकेगा और मूट कोर्ट का गठन विद्यार्थियों को इस प्रकार का अवसर प्रदान करता है।

वादों को दृष्टांत स्वरूप प्रस्तुत करना एक कला है तथा यह कला वाद को जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। कम से कम लेकिन महत्वपूर्ण वादों का पेश करना अधिक अच्छा समझा जाता है, अपेक्षकृत इसके कि भारी मात्रा में ऐसे वादों को पेश किया जाय जिनमें विधि के एक ही अथवा एक से सिद्धान्त अन्तर्विष्ट हों अथवा विधि के ऐसे सिद्धान्त अन्तर्विष्ट हों जो वाद में अन्तर्ग्रस्त विवाद्यकों के लिए सुसंगत न हों। इसके अतिरिक्त, दृष्टान्त स्वरूप प्रस्तुत वाद में निर्णय की आलोचना की जाती है, तो अधिवक्ता को यह स्मरण रखना होगा कि आलोचना निर्णय अथवा विनिप्रस्तुत वाद में निर्णय की आलोचना की जाती है, तो अधिवक्ता को यह स्मरण रखना होगा कि आलोचना निर्णय अथवा विनिश्चयन के कारण की होनी चाहिए, न कि न्यायाधीश के आचरण की। आलोचना न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा(Integrity)  निष्पक्षता अथवा योग्यता की नहीं होनी चाहिए। सुसंगत वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करने और तत्पश्चात्, अंगीकृत निर्वचन के समर्थन में न्यायिक विनिश्चयों सहित कारणों को पेश करना बेहतर होता है। सम्पूर्ण आख्या वाद में विधि के सिद्धान्तों को निर्दिष्ट कराने के लिए परिपूर्ण रूप् से वास्तविक होनी चाहिए। भिन्न वादों में निर्दिष्ट विधि के सिद्धान्तों को अन्तर्विष्ट करते हुए वैयक्तिक टिप्पणियों (Personal notes)  को तैयार करना बेहतर होता है। नोट बुक वर्ष क्रमानुसार के अलावा विषय क्रमानुसार (Subject wise) तैयार की जानी चाहिए। इस प्रयोजनार्थ, कम्प्यूटर जैसे आधुनिक उपकरणों, आदि का भी प्रयोग किया जा सकता है।

मुवक्किल से संव्यवहार करना भी एक कला है और इसे अभ्यास द्वारा प्राप्त किया जाता है। मुवक्किल से संव्यवहार करते समय, अधिवक्ता का निष्पक्ष एवं ईमानदार होना अत्यन्त जरूरी है। उसे किसी वाद की सफलता की संभावनाओं का ईमानदारी एवं निष्पक्षता के साथ मूल्यांकन करना चाहिए और तदनुसार मुवक्किल को सलाह देनी चाहिए। के0वी0 कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा हैः

जो मुवक्किल आपके पास सहायता के लिए आता है उसका दयालुता के साथ स्वागत करो तथा जो कुछ उसे कहना है, उसे पूरी तरह से सहानुभूतिपूर्वक सुनो। वह अपनी किसी बात को दोहरा सकता है लेकिन उसे झिड़को मत। उसे अपनी पूरी बात कहने दो। वह नाटकीय

हो सकता है, वह निष्क्रिय तथा दूसरे पक्ष का दुरुपयोग;ंइनेमद्ध  हो सकता है। वह बोल सकता है, इस तरह से नहीं मानों वह किसी जूरी को सम्बोधित कर रहा हो जिस प रवह अपने वाद के बल एवं सत्यता का प्रभाव जमाना ;पउचतमेेद्ध  चाहता है। लेकिन, यह अच्छा हीे हो कि आप पूरी कहानी सुनें, क्योंकि वह वांछनीय है कि आप एक भी सुसंगत तथ्य से चूकें नहीं, यद्यपि आपको ऐसा तथ्य बहुत से असंगत तथ्यों की छंटायी करके ही प्राप्त हो सकता है। ऐसे किसी तथ्य को, जो आवश्यक साबित हो सकता है, गवाने की सम्भावना का जोखिक उठाने के बजाय निरर्थक तथ्यों को सुनना कम असुविधजनक होता है। अपने मुवक्किल को उसके आख्यान में टोंके नहीं, बल्कि अपने प्रश्न को उसके विराम तक सुरक्षित रखें।

मुवक्किल से संव्यवहार करते समय अधिवक्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने मुवक्किल के प्रति अपने कर्तव्यों के सम्बन्ध में भारतीय विधिज्ञ परिषद के नियम को मस्तिष्क में रखेगा।

उपरोक्त गुण न्यायालय की कार्यवाहियों के अलावा मुवक्किल तथा न्यायाधीशों के साथ अधिवक्ताओं के संव्यवहार का सतर्कतापूर्वक अवलोकन करके प्राप्त किया जा सकता है। मूट कोर्ट में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को वाद पत्र तथा लिखित कथन प्रारूपित करने, साक्षियों की परीक्षा तथा प्रतिपरीक्षा करने एवं वाद पर बहस करने  आदि की पूर्ण जानकारी आवश्यक है। मूट कोर्ट उन्हें उनके सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यावहारिक समस्याओं अथवा उन्हें समनुदेशित किये गये वादों या विवादकों को लागू करने का अवसर प्रदान करेगा। वे अधिवक्ताओं के रूप में नामांकित हुए बिना ही व्यवसायिक ज्ञान प्राप्त कर सकेगें।

मूट कोर्ट गठित अथवा संचालित करने की रीति –

मूट कोर्ट  अनेक प्रकार से गठित एवं संचालित किये जा सकते हैं, लेकिन उसका उद्देश्य सदैव मस्तिष्क में रखा जाना चाहिए। इसे विद्यार्थियों को विधिक बहस की तैयारी तथा उसे पेश करने का अवसर और उन्हें, जहाँ तक सम्भव हो, वकालत की प्रक्रिया का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना होना चाहिए। विद्यार्थियों को व्यक्तियों के समूह के समक्ष विधि के बिन्दु पर बहस करने का अवसर प्राप्त होना चाहिए। इस प्रकार, मूट कोर्ट (आभासी न्यायालय) का संचालन इस प्रकार किया जाना चाहिए जिससे कि विद्यार्थियों की व्यावहारिक कुशलता का विकास हो।

मूट कोर्ट को गठित करने एवं संचालित करने की निम्नलिखित रीतियाँ उल्लेखनीय हैं-

काल्पनिक विधिक वाद-

मूट कोर्ट (आभासी न्यायालय) को संचालित करने की सबसे महत्वपूर्ण पद्धति काल्पनिक वाद तैयार करना है और विद्यार्थियों के एक समूह को एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करने का कार्य सौंपा जाना चाहिए तथा किसी दूसरे समूह को वाद के अन्य पक्ष का प्रतिनिधित्व करने का कार्य सौंपा जाना चाहिए। यह वाद सिविल वाद अथवा दाण्डिक वाद हो सकता है। यह रिट याचिका भी हो सकती है। प्रत्येक वाद में विद्यार्थियों को वाद का संचालन उसी प्रकार से करना चाहिए जैसे कोई  अधिवक्ता अपने मुवक्किल का वाद संचालित करता है। विद्यार्थियों से वाद-पत्र तैयार करने के लिए कहा जाना चाहिए, यदि वह वादी का प्रतिनिधित्व करता है। यदि वह प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व करता है, तो उसे लिखित कथन तैयार करना चाहिए।

रिट याचिका की दशा में, उन्हें याचिका प्रारूपित करने के लिए कहा जाना चाहिए और प्रतिपक्षी का प्रतिनिधित्व करने वाले विद्यार्थियों से याची के तर्को का वितर्क करने के लिए कहा जाना चाहिए ताकि उसको याचिका मंजूर न की जा सके। दाण्डिक वादों में परिवाद-लेखन, दण्ड न्यायालयों के क्षेत्राधिकार एवं शक्तियों, अन्तर्वलित विधिक  विवाद्यकों की अवधारणा, विवाद्यकों पर सामग्री का संग्रह तथा अन्तिम बहस पर बल दिया जाना चाहिए। इस प्रकार के शास्त्रार्थ में, बहसकर्ताओं को वाद-पत्रों के तैयार करने, लिखित कथनों तथा परिवादों के लेखन आदि का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो सकेगा। वे प्रति-परीक्षा तथा बहस की कला भी सीख सकेंगे।

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सिविल वादों में वाद, वाद-पत्र के पेश किये जाने से प्रारम्भ होता है। वाद-पत्र में, उस न्यायालय का नाम जिसमें वाद की ईप्सा की जाती है? वादी और प्रतिवादी का नाम, विवरण तथा निवास-स्थान, वाद-हेतुकों को गठित करने के तथ्य और कब वह उद्भूत हुआ, दावाकृत अनुतोष, क्षेत्राधिकार तथा न्यायालय-शुल्कों, आदि के प्रयोजनार्थ वाद की विषय-वस्तु का मूल्य स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए। जहाँ वाद की विषय-वस्तु स्थावर सम्पत्ति हो, वाद-पत्र में सम्पत्ति का इतना विवरण अन्तर्विष्ट होगा, जिससे कि उसे पहचाना जा सके और यदि यह सम्पŸिा सीमाओं अथवा बन्दोबस्त अभिलेख में संख्याएं अथवा सर्वेक्षण द्वारा पहचाना जा सके, तो वाद-पत्र में इन सीमाओं अथवा संख्याओं को विनिर्दिष्ट किया जायेगा।

वाद-पत्र के दाखिल किये जाने के पश्चात्, जिसके अधीन वाद दाखिल किया जाता है, वाद-पत्र में बताये गये तथ्यों को स्वीकार करने अथवा उनका प्रत्याख्यान करने और अपना निजी वाद पेश करने का अवसर प्रदान किया जाता है। इसे लिखित कथन कहा जाता है। सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश टप्प्प् में लिखित कथनों से सम्बन्धिम नियम अन्तर्विष्ट  होते हैं। नियम के अनुसार, प्रतिवादी प्रथम सुनवाई को या उसके पूर्व या ऐसे समय के भीतर, जैसा न्यायालय अनुमति प्रदान करे, और यदि न्यायालय द्वारा अपेक्षा की जाये, अपनी प्रतिरक्षा का लिखित कथन पेश करेगा। लिखित कथनों के पेश किये जाने के पूर्व, वाद पत्र की सतर्कतापूर्वक जाँच  की जानी चाहिए और तब लिखित कथनों को तैयार किया जाना चाहिए।

वास्तव में, वाद-पत्र को प्रारूपित करना एक कला है तथा सु-प्रारूपित वाद-पत्र वह है जो स्पष्ट स्थिति बताता है और उन तथ्यों की खिचडी नहीं पकाता हैं जिनका अनुसरण करना कठिन है। इसे छोटे-छोटे पैराग्राफों में बाँट दिया जाना चाहिए और घटनाओं और तारीखों के अनुक्रम का अनुसरण करना चाहिए। वाद-हेतुक का स्थान तथा तारीख, वह तथ्य जो समायावधि के भीतर है मूल्यांकन तथा दावाकृत अनुतोष को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए।

म्ुख्य न्यायाधीश, डॉ0 बी0 मलिक, ने यह कहा है कि दूसरा पक्ष जिसकी अधिवक्ता को प्रतिरक्षा करनी है, के सम्बन्ध में भी उक्त प्रकार के नियम लागू होते हैं। उसे स्पष्ट प्रतिरक्षा सिद्ध करनी पड़ती है, अधिकथित तथ्यों को स्पष्ट रूप से स्वीकार अथवा उसका प्रत्याख्यान किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसे तथ्य हो सकते हैं जिनके बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है तथा वह चाहेगा कि वादी उसे सिद्ध करें, वह यह कह सकता है, यह ‘स्वीकृत नही’ है। उसके पास सम्पूर्ण वाद के सम्बन्ध में अपना निजी वृतान्त देने का और अपनी निजी प्रतिरक्षा को स्पष्ट तर्कपूर्ण भाषा में अपवर्णित करने का अधिकार भी है जिसके लिए वादी के पास प्रत्युŸार का अधिकार है।

वाद पर बहस करना वाद को जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अनुभव किसी व्यक्ति को इस ढंग से वाद पर बहस करने की कला समझने में समर्थ बनाता है जिससे न्यायाधीश में विश्वासोत्पादित किया जा सके। बहस की तैयारी के लिए, बहस करने वाले व्यक्ति को पक्षकारों के अभिवचनों की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए, उसे साक्षियों द्वारा दिये गये तथ्यों एवं साक्ष्यों की स्वीकृतियों एवं प्रत्याख्यानों की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। किसी वाद पर बहस करने में, सबसे अधिक प्रबल बिन्दुओं पर बल दिया जाना चाहिए। ऐसे प्रबलतम बिन्दु पर तब तक बहस करते रहना चाहिए जब तक न्यायालय का उन्हें समझ जाना प्रकट न हो।

इस प्रकार, मूट कोर्ट संचालित करने की रीति अत्यन्त महत्व की है। यह बहस करने वाले व्यक्तियों को वकालत की कला का ज्ञान प्राप्त कराती है। इसमें तथ्यों को सिद्ध किया जाना चाहिए  तथा बहसकर्ताओं को इस निमित्त तैयार काल्पनिक वाद में अर्न्तग्रस्त विधि के प्रश्न पर ही बहस करनी चाहिए। काल्पनिक वाद होने के कारण, साक्षियों की परीक्षा तथा प्रति-परीक्षा अत्यंत कठिन कार्य होगा। बहसकर्ताओं को अंक प्रदान करने में प्रस्तुतीकरण के कौशल को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

निर्णीत वाद

मूट कोर्ट को गठित करने अथवा संचालित करने की एक पद्धति यह भी है कि किसी निर्णीत वाद पर बहस की जाये। इस प्रयोजनार्थ न्यायालय द्वारा किसी वर्णित वाद का चयन किया जाना चाहिए और दूसरे समूह से उक्त सिद्धान्तों के विरूद्ध बोलने के लिए कहा जाना चाहिए अर्थात् विनिर्णय में दोषों को बताना चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी से उसे अनुज्ञात समय के भीतर बोलने के लिए ही कहा जाना चाहिए। प्रत्येक पक्ष को लिखित निवेदन दाखिल करने चाहिए तथा कारण बताते हुए दूसरे पक्ष के तर्को का प्रत्युत्तर  देना चाहिए। प्रत्येक पक्ष को अपने मत के समर्थन में साक्ष्य एकत्र करने का युक्तियुक्त समय देना चाहिए। इसमें विधि-पुस्तकालय का परिदर्शन करने, विधि पुस्तकों तथा पत्रिकाओं को पढ़ने और बहस का पता लगाने तथा उसका  मूल्यांकन करने में समर्थ हो सकेंगे। वे न केवल निर्णय आधार का पता लगाने में समर्थ हो सकेंगे बल्कि वह उसकी विशुद्धता तथा प्रभावों के बारे में निष्कर्ष प्राप्त कर सकेंगे। इससे विद्यार्थियों की विधिक बिन्दुओं पर बहस करने की क्षमता का विकास होगा।

मूट कोर्ट में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के हावभाव के साथ ही उनके बोलने के ढंग पर भी विचार किया जाना चाहिए। न्यायाधीशों के विचारों की आलोचना करने में, भाषा नम्र एवं शिष्ट होनी चाहिए। निर्णय की आलोचना की जानी चाहिए, न कि उस न्यायाधीश के आचरण की जिसने निर्णयों को दिया था। यह बात सदैव मस्तिष्क में रखी जानी चाहिए कि न्यायाधीश के आचरण की आलोचना करना न्यायालय के अवमान की श्रेणी में आएगा। इस ¬प्रकार के मूट कोर्ट में प्रत्येक विद्यार्थी को अपना लिखित तर्क दाखिल करने के लिए कहा जाना चाहिए। यदि किसी पक्ष में एक से अधिक विद्यार्थी हैं तो प्रत्येक विद्यार्थी को पृथक् रूप से अपना तर्क दाखिल करना चाहिए। तत्पश्चात् प्रत्येक विद्यार्थी को अपने लिखित तर्क को स्पष्ट करने के लिए 10 मिनट तक बोलने के लिए कहा जाना चाहिए।

इस प्रकार मूट कोर्ट विद्यार्थियों को अभ्यास द्वारा विधि सीखने के अवसर प्रदान करता है। यह बहसकर्ताओं की विधिक कुशलता, प्रस्तुतीकरण कुशलता तथा बहसकर्ताओं की पेश करने की कुशलता का भी विकास करता है। यह उन्हंे कक्षाओं के समक्ष बोलने और बिना आत्म नियंत्रण खोये प्रश्नों का उŸार देने का अवसर प्रदान करता है।

तथापि मूट कोर्ट गठित करने का कार्य सरल कार्य नहीं है। इसमें अच्छे पुस्तकालय, पर्याप्त अध्यापक कक्ष तथा विश्वविद्यालयों एवं कालेजों, सरकार, न्यायाधीशों तथा अधिवक्ताओं के पूर्ण सहयोग की अपेक्षा की जाती है। कालेजों तथा विश्वविद्यालयों में विधि अध्यापन के व्यावहारिक पहलू पर विचार किया जाना चाहिए। अब 18 विषयों  के स्थान पर 28 विषय केवल विधि स्नातक में पढ़ाये जाते है। इसके अतिरिक्त एल-एल0एम0 में पढ़ाये जाने वाले विषय भी हैं। शिक्षकों की संख्या उतनी ही है। इसके अतिरिक्त अधिकांश विश्वविद्यालयों एवं विद्यालयों में रिक्त पदों को शीघ्रता से नहीं भरा जाता है। अधिकांश राज्यों की सरकारों का दृष्टिकोण विŸाीय अभाव के आधार पर पदों को बढ़ाने के बजाय घटाना प्रतीत होता है। इन परिस्थितियों में विधिज्ञ परिषद द्वारा बनायी गयी स्कीम का पालन अत्यन्त कठिन है। विधिज्ञ परिषद, सरकार तथा विश्वविद्यालय या कालेजों को इस समस्या की जाँच करनी चाहिए और विधि अध्यापकों की संख्या बढ़ाकर तथा विŸाय सहायता प्रदान करके उसे हल करने का प्रयास करना चाहिए। पुस्तकालयों को सुसंगत पुस्तकें तथा विधि रिपोर्टें आदि क्रय करने के लिए पर्याप्त सहायता प्रदान करना चाहिए। यह समुचित रूप से देखा जाना चाहिए कि सुसंगत पुस्तकों का क्रय किया जाये और अनुदान का दुरुपयोग न हो, विधिज्ञ परिषद को यह भी देखना चाहिए कि योजना का वास्तविक रूप से पालन हो और यह केवल कागज पर ही सीमित न रह जाए।

विनिर्दिष्ट विधिक विषय पर मूट कोर्ट

किसी विनिर्दिष्ट विधिक विषय का चयन किया जा सकता है और विद्यार्थियों से सामग्री एकत्र करने, अपने लिखित पत्र दाखिल करने और विनिर्दिष्ट समय के भीतर बोलने के लिए कहा जा सकता है जिससे कि वे अपने तर्को को स्पष्ट कर सकें। मूट कोर्ट में प्रस्तुत विद्यार्थियों, अध्यापकों आदि द्वारा उन्हें प्रश्न दिये जा सकेंगे। विद्यार्थियों को समूहों में विभक्त किया जाना चाहिए और एक ही समूह के विद्यार्थियों को सामग्री एकत्र करने और सामूहिक रूप से बहस तैयार करने के लिए कहा जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में भी समूह के प्रत्येक विद्यार्थी को लिखित तर्को आदि का स्पष्टीकरण करने के लिए कुछ समय तक बोलने के लिए कहा जाना चाहिए। इसके लिए विद्यार्थियों से पुस्तकालय का परिदर्शन करने, पुस्तकों, जर्नलों तथा लेखों को पढ़ने और बहस करने तथा बोलने की शक्ति का विकास करने की अपेक्षा की जाती है। इससे न केवल विधिक कुशलता बल्कि प्रस्तुतीकरण कुशलता का भी विकास होगा।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *